रोहतास [प्रमोद टैगोर]। ‘मोदी जी, आप बेहतर प्रधानमंत्री हैं। आपसे देश के लोगों की उम्मीदें जुड़ी हैं। पीएम साहब अब कुछ कीजिए! दर्द असहनीय हो गया है। कार्रवाई ऐसी हो, जिससे कश्मीर पाने की पाक की सोच पर हमेशा के लिए पानी फिर जाए …आखिर कब तक शहादत राजनीति की भेंट चढ़ती रहेगी?’

ये मजमून 16 फरवरी 2002 को उड़ी में आतंकियों से मुठभेड़ में शहीद कहुआरा गांव के अरविंद कुमार के वृद्ध पिता मुनीराज ङ्क्षसह द्वारा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लिखे पत्र का है। उड़ी सेक्टर के आर्मी कैंप में आतंकी हमले में शहीद जवानों की खबर ने 14 साल बाद फिर उनके जख्म हरे कर दिए हैं।

वे लिखते हैं कि आखिर कब तक मिटता रहेगा सुहागिनों की मांग का सिंदूर? अपने सपूतों को खोने के गम में कब तक रोती रहेगी मां? क्या मजबूरियां हैं कि पड़ोसी देश पर जवाबी कार्रवाई नहीं की जा रही? अगर हालात नहीं सुधरे तो कोई मां-बाप अपने बेटे को देश का सिपाही बनने को प्रेरित नहीं करेगा।

खड़े किए कई सवाल

पत्र में उन्होंने लिखा- मोदी साहब! एक शहीद के पिता होने के नाते शहादत के दर्द को मैं अच्छी तरह समझता हूं। लेकिन, दुख होता है कि हर शहादत राजनीति की भेंट चढ़ जाती है। 2002 में बेटे अरङ्क्षवद की शहादत के बाद भी मैंने हिम्मत नहीं हारी और अपने अन्य दो बेटों अमित व हरेंद्र को आर्मी में भेजा। हम शहादत की कहानी लिखते रहें और पाक अपनी कामयाबी का जश्न मनाता रहे। यह कब तक चलेगा?

गांव के 40 जवान सीमा पर तैनात

कहुआरा गांव के 40 जवान देश की सीमा पर तैनात हैं। 50 से अधिक रिटायर्ड होकर गांव में रह रहे हैं। सेवानिवृत फौजी सूबेदार कुलवंशसिंह, रामअवधेश सिंह, पारसनाथ सिंह, धामुनी सिंह, लालमोहर सिंह सहित अन्य रिटायर्ड फौजियों के मन में भी इसी तरह के सवाल कौंध रहे हैं।